आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४१

वैशम्पाय़न उवाच

पाण्डवास्तु महेष्वासं कर्णं सौभद्रमेव च |  ४   क
सम्प्रहर्षात्समाजग्मुर्द्रौपदेय़ांश्च सर्वशः ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति