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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
वन्धनानि च राजेन्द्र सञ्छिद्य तुरगा द्विपाः |  ८५   क
समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति