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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा सम्प्रवृद्धं तपो महत् |  ३   क
उद्धर्तुकामो मतिमान्पुत्रो जज्ञे पुरन्दरः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति