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विराट पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वं पुच्छान्विधुन्वाना रेभमाणाः समन्ततः |  २३   क
गावः प्रतिन्यवर्तन्त दिशमास्थाय़ दक्षिणाम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति