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वन पर्व
अध्याय ३२
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युधिष्ठिर उवाच
अतो नार्हसि कल्याणि धातारं धर्ममेव च |  १४   क
रजोमूढेन मनसा क्षेप्तुं शङ्कितुमेव च ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति