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सभा पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा तान्दुःखितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्धृतराष्ट्रजः |  ११   क
क्लिश्यमानां च पाञ्चालीं विकर्ण इदमव्रवीत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति