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विराट पर्व
अध्याय ४१
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उत्तर उवाच
नैवंविधः शङ्खशव्दः पुरा जातु मय़ा श्रुतः |  १४   क
ध्वजस्य चापि रूपं मे दृष्टपूर्वं न हीदृशम् |  १४   ख
धनुषश्चैव निर्घोषः श्रुतपूर्वो न मे क्वचित् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति