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विराट पर्व
अध्याय ४१
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द्रोण उवाच
गोमाय़ुरेष सेनाय़ा रुवन्मध्येऽनुधावति |  २२   क
अनाहतश्च निष्क्रान्तो महद्वेदय़ते भय़म् |  २२   ख
भवतां रोमकूपाणि प्रहृष्टान्युपलक्षय़े ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति