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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् |  ४१   क
अभिदुद्राव संरव्धो वलो वज्रधरं यथा ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति