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विराट पर्व
अध्याय ४०
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अर्जुन उवाच
एतान्सर्वानुपासङ्गान्क्षिप्रं वध्नीहि मे रथे |  ४   क
एतं चाहर निस्त्रिंशं जातरूपपरिष्कृतम् |  ४   ख
अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति