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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं; युवा युवानं वृषसेनं शरौघैः |  ७   क
समार्दय़त्कर्णसुतश्च वीरः; पाञ्चालेय़ं शरवर्षैरनेकैः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति