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द्रोण पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
आसनं प्राप्य राजा तु मूर्छय़ाभिपरिप्लुतः |  ५   क
निश्चेष्टोऽतिष्ठत तदा वीज्यमानः समन्ततः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति