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भीष्म पर्व
अध्याय ४१
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सञ्जय़ उवाच
श्रूय़ते हि पुराकल्पे गुरूनननुमान्य यः |  १८   क
युध्यते स भवेद्व्यक्तमपध्यातो महत्तरैः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति