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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचाः सर्व एव समन्ततः |  १३   क
दंशिता विविधैस्त्राणैर्विविधाय़ुधपाणय़ः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति