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उद्योग पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशो योजनमात्रमन्तरं; स तिर्यगूर्ध्वं च रुरोध वै ध्वजः |  ९   क
न संसज्जेत्तरुभिः संवृतोऽपि; तथा हि माय़ा विहिता भौवनेन ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति