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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
छत्रैराभरणैर्वस्त्रैर्माल्यैश्च सुसुगन्धिभिः |  ४५   क
हारैः किरीटैर्मुकुटैरुष्णीषैः किङ्किणीगणैः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति