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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रास्यमाना पुनः पुनः |  ४८   क
भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति