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द्रोण पर्व
अध्याय ४१
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु क्षत्रिय़ा भारं सैन्धवे सर्वमर्पितम् |  २०   क
उत्क्रुश्याभ्यद्रवन्राजन्येन यौधिष्ठिरं वलम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति