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शल्य पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् |  ११   क
आनय़िष्यति वेगेन वसिष्ठं जपतां वरम् |  ११   ख
इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशय़ः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति