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शल्य पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
उभय़ोः शापय़ोर्भीता वेपमाना पुनः पुनः |  २१   क
चिन्तय़ित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति