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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
प्रादुष्करोम्येष महास्त्रमुग्रं; शिवाय़ लोकस्य वधाय़ सौतेः |  २३   क
तन्मेऽनुजानातु भवान्सुराश्च; व्रह्मा भवो व्रह्मविदश्च सर्वे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति