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शल्य पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान्सुमहत्तपः |  ५   क
यत्रास्य कर्म तद्घोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति