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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
धूम्रं रूपं च यत्तस्य धूर्जटीत्यत उच्यते |  १२   क
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन्विश्वरूपस्ततः स्मृतः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति