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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद्भूमिमरिन्दमः |  ५३   क
लोहिताङ्ग इवादित्यो दुर्दर्शः समपद्यत |  ५३   ख
एवं तं निहतं सङ्ख्ये ददृशे सैनिको जनः ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति