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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणाय़ निहतं शंस राजञ्शारद्वतीसुतम् |  १०४   क
त्वय़ोक्तो नैष युध्येत जातु राजन्द्विजर्षभः |  १०४   ख
सत्यवान्हि नृलोकेऽस्मिन्भवान्ख्यातो जनाधिप ||  १०४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति