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अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
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भीष्म उवाच
आवय़ोरनृतं प्राह यस्तस्याथ द्विजस्य वै |  २१   क
विपुलस्य परे लोके या गतिः सा भवेदिति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति