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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
आपश्चुक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा |  १४   क
व्यद्रवन्गिरय़श्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति