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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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कृप उवाच
मनोरथप्रलापो मे न ग्राह्यस्तव सूतज |  ३२   क
यदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति