आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ४२

व्रह्मो उवाच

स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति यत्परम् |  ५८   क
मनो मनसि सन्धाय़ पश्यत्यात्मानमात्मनि ||  ५८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति