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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
सुकृतो यत्र ते यज्ञस्तत्र देवा हितास्तव |  १२   क
यदा समन्विता देवाः पशूनां गमनेश्वराः |  १२   ख
गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवन्ति ते ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति