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वन पर्व
अध्याय २३८
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दुर्योधन उवाच
रिपूणां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि |  १६   क
आत्मदोषात्परिभ्रष्टः कथं वक्ष्यामि तानहम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति