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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
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सूत उवाच
यावन्न क्षीय़ते कर्म तावदस्य स्वरूपता |  ८   क
सङ्क्षीणकर्मा पुरुषो रूपान्यत्वं निय़च्छति ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति