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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
आह्वय़े त्वां रणं गच्छ मय़ा सार्धं जनार्दन |  २   क
यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवैः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति