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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
समापय़ामास च तं राजसूय़ं महाक्रतुम् |  ३४   क
तं तु यज्ञं महावाहुरा समाप्तेर्जनार्दनः |  ३४   ख
ररक्ष भगवाञ्शौरिः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति