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द्रोण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
न सन्दधन्न चाप्यस्यन्न विमुञ्चन्न चोद्धरन् |  २४   क
मण्डलेनैव धनुषा नृत्यन्पार्थः स्म दृश्यते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति