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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्वगच्छंस्तथैवान्यान्क्षत्रिय़ान्क्षत्रिय़र्षभाः |  ४४   क
एवं सम्पूजितास्ते वै जग्मुर्विप्राश्च सर्वशः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति