सभा पर्व  अध्याय ४२

वैशम्पाय़न उवाच

अनुज्ञातस्त्वय़ा चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे |  ५२   क
सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजय़त केशवः ||  ५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति