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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
निष्क्रम्यान्तःपुराच्चैव युधिष्ठिरसहाय़वान् |  ५३   क
स्नातश्च कृतजप्यश्च व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति