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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो मेघवरप्रख्यं स्यन्दनं वै सुकल्पितम् |  ५४   क
योजय़ित्वा महाराज दारुकः प्रत्युपस्थितः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति