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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशां पते |  ५८   क
पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजाः |  ५८   ख
वान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति