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वन पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
संस्तूय़मानो गन्धर्वैरृषिभिश्च तपोधनैः |  १५   क
शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति