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वन पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान्समागतान् |  १७   क
दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हो हि दर्शनम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति