वन पर्व  अध्याय ४२

वैशम्पाय़न उवाच

अक्षय़ा तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फल्गुन |  २२   क
त्वय़ा साक्षान्महादेवस्तोषितो हि महामृधे |  २२   ख
लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह ||  २२   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति