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विराट पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषामेव महावीर्यः कश्चिदेव पुरःसरः |  १४   क
अस्माञ्जेतुमिहाय़ातो मत्स्यो वापि स्वय़ं भवेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति