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विराट पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्वानां हेषितं श्रुत्वा का प्रशंसा भवेत्परे |  २३   क
स्थाने वापि व्रजन्तो वा सदा हेषन्ति वाजिनः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति