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उद्योग पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो राजा धृतराष्ट्रो मनीषी; सम्पूज्य वाक्यं विदुरेरितं तत् |  १   क
सनत्सुजातं रहिते महात्मा; पप्रच्छ वुद्धिं परमां वुभूषन् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति