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उद्योग पर्व
अध्याय १९४
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सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां पुनरेव सुतस्तव |  १   क
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य पितामहमपृच्छत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति