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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
व्यतिक्रमोऽय़ं सुमहांस्त्वय़ा राजन्नुपेक्षितः |  ११   क
समर्थेनापि यन्मोहात्पुत्रस्ते न निवारितः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति