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अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
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भीष्म उवाच
विधूय़ कलुषं सर्वं विरजाः संमतः सताम् |  ८०   क
लोके महीय़ते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति