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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
मोहय़ित्वा रणे पार्थान्वज्रहस्त इवासुरान् |  ३१   क
स कथं निहतः शेते वातरुग्ण इव द्रुमः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति