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द्रोण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
यतमानास्तु ते वीरा मत्स्यपाञ्चालकेकय़ाः |  १८   क
पाण्डवाश्चान्वपद्यन्त प्रत्यैकश्येन सैन्धवम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति